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संघर्षों से तपकर सफलता के शिखर पर पहुंची लोकगायिका हेमा नेगी करासी !! जानिए कैसा रहा उनका सफर !!

हेमा नेगी करासी गढवाल की प्रसिद्ध लोकगायिका हैं यूं तो वे लोकगीतों अेोर गाथाओं को स्वर देती आ रही हैं लेकिन खास पहचान उनकी गढवाली जागरों अर्थात गाथाओं के गायन में हैं। वे संघर्षो से उपजी एक आवाज है। अनेक बाधाओं का सामना करते हुए हेमा नेगी ने यह मुकाम हासिल किया है। हेमा दो दशक से अधिक समय से भी लोकगीत अेोर गढवाली जागर गा आ रही हैं जितनी प्रभावोत्पादकता उनके जागरों में हैं ,उतने ही आकर्षण उनके लोकगीत भी करते हैं। स्टेज ,सीडी अेोर एलबमों में धार्मिक गाथाओं को गाने को वाली वे उत्तराखण्ड की पहली माहिला हैं ,जिनके जागरों में मेोलिकता के कारण उन्हें बहुत पसंद किया जाता हैं वे दूरदंर्शन आकाशवाणी से अेोर स्टेज प्रोग्रामों और देश विदेश में आवाज दे चुकी हैं।
परिवार में गायन की पृष्ठभूमि न होने के बावजूद हेमा में गायन की खास प्रतिभा है ।पहली बार उन्होंने तब गाया जब वे तीसरी कक्षा में थी इसके बाद यह यात्रा अनवरत चल पडी। छठी कक्षा में पढाई के दौरान अच्छे गायन के लिए उन्हें पुरस्कार मिला तो हेमा अेोर उनकी मां की खुशी का ठिकाना नहीं रहा।इस पुरस्कार ने हेमा अेोर उनकी मां को बडी उर्जा दी अेोर हेमा की मां ने उन्हें गायन के लिए कुछ सीमा तक प्रोत्साहित करना आरभं कर दिया। फिर ग्यारहवीं की छात्रा के रूप में कांडई ,रूद्रप्रयाग में एक कार्यकम्र में हेमा ने धरती हमारा गढवालै की कथगा रौंतेलि स्वाणी चा गाया तो वहाँ मेोजूद कोई भी श्रोता प्रभावित हुए बिना नही रह पाया। कभी कमजोर आर्थिक स्थिति अेोर सामाजिक कारणों से हेमा की प्रतिभा या़त्रा में रोडे आते रहे,लेकिन उन्हे जहां मेोका मिलता, पूरे मनोयोग से गा लेती ,परिणाम स्वरूप उन्हें खूब वाहवाही मिलती। उन्होंने गढवाल के प्रसिद्ध गायक नरेन्द्र सिंह नेगी के साथ सबसे पहले 2007 में गायन किया तो उनकी पहचान कांडई क्षेत्र से बाहर होने लगी।नेगी के साथ पहली बार हेमा ने कार्तिक स्वाामी का भजन गाया तो उनके गेोरव,आत्माविश्वास अेोर प्रसन्नता का ठिकाना नहीं रहा। नेगी जी को हेमा की आवाज अेोर गायन शैली ने मुग्ध किया कि इसके बाद से वे हेमा को अपने कार्यक्रमों में गायन के लिए यदा कदा बुलाते रहते है उन्होंने वीरेन्द्र नेगी गिरीश शर्मा के साथ पहला गायन ‘क्य ब्वन तब’ किया। गढवाली फिल्मों में भी गायकी का योगदान देते हुए हेमा ने आस अेोलाद अेोर लाडौ कु ब्यो के लिए गीत गाए, मगर हेमा की पहचान वर्तमान में ठेठ पांरपरिक गढवाली शैली में जागर गायन की बन चुकी है नंदा से लेकर नागराजा अेोर पंडों लेकर अन्य कई देवी देवताओं के जागर को हेमा ने स्वर दिए है। वे गढवाल की पहली गायिका महिला हैं ,जिन्होंने नंदा के जागरों की सीडी निकाली है। जागरों का कुछ संग्रह उन्होंने अपनी मां से किया अेोर कुछ जागर अपनी मेोसी से सुने। इसके अतिरिक्त हेमा अपने ससुराल अेोर मायके के क्षेत्र मे अनुष्ठानों आदि के समय में जाकर जागरों का संग्रह करती
हैं । अेोर फिर उनका गायन करती हैं हेमा के गायकी के करियर में कई बाधाएं आई पर उन्हें दूर करने के लिए अपनों ने ही मदद की। विद्यार्थी जीवन में मां ने सहयोग दिया, इसके बाद बडी बहन अनीता कंडारी ने अेोर शादी के बाद पति अनिल करासी ने भरपूर योगदान दिया। अब गृहस्थी का कुशल संचालन करने के बाद भी न केवल गायन की बरकारी के लिए ,बल्कि इस क्षेत्र में अेोर कुछ करने के लिए जी तोड परिश्रम कर रही हेमा किसी तरह घर में समय मिलने पर सरस्वती साधना में लग जाती हैं।जागर की प्राचीन शैली में गायन का उन्हें कभी भी प्रशिक्षण नहीं मिला अेोर न ही यह विधा उन्होंने कहीं से सीखा है।हेमा के अनुसार जागरों के कथानक बोल अेोर कुछ धुनें उन्हें अपने क्षेत्र के जागर अनुष्ठानों के साथ ही अपनी मां मेोसी आदि बुजुर्गो से मिलते है कुछ की धुनें वे स्वंय बना लेती हैं हेमा की विशेषता है। कि वे जागर या गीत रचनाओं को लिखने में किसी की सहायता नहीं लेती।वे इन रचनाओं को स्ंवय ही गाती हैं उनके गायन की एक विशेषता यह भी है कि वे किसी रचनाकार की लिखी रचनाएं नहीं गाती हैं अेोर न ही किसी गायक गायक के गाए गीत गीती है। हेमा इस समय संस्कृति विभाग में ए अेोर दूरदर्शन तथा आकाशवाणी में बी ग्रेड की कलाकार है।केदारनाथ आपदा के बाद उन्होंने प्रभावितों के लिए आयोजित कार्यक्रमों में नि शुल्क प्रस्तुतियां दी। हेमा नेगी ने एक बार ऐसे ही कार्यक्रम में नगर निगम हाॅल में जब आपदा से हुए विनाश पर एक बच्चे की दशा पर करूण रस से पूर्ण गीत -क्या खाई तेरू हमुन केदार बाबा,दरसन कनुक आंया छां तेरा द्धार,कुलदेवी समझी तू थाती क्षेत्रपाल गाया तो वहां दर्शकों की आखे नम हो गई थी यहीं नही,हेमा ढोल वादन में सिद्धहस्त हैं।कई अवसरों पर वे ढोल भी बजा लेती हैं। अभी तक हेमा नेगी करासी करीब 110 रचनाओं को स्वर दे चुकी है। इनमें जागर गीत ,भजन आदि शामिल हैं। उनकी रचनाओं के 25 एलबमों बाजार में आ चुके है। इसमें गिर गेंदुआ ,माँ मठियाणा माई,मिठु-मिठु बोलि,मैणा बेोजी,कथा कार्तिक स्वामी आदि शामिल हैं।